Amar Ujala
25 Jun '26

अहंकार का विलोप ही शिवत्व: आचार्य प्रशांत

Acharya Prashant

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अहंकार का विलोप ही शिवत्व: आचार्य प्रशांत

ग्रेटर नोएडा। जीबीयू में आयोजित एक कार्यक्रम में पहुंचे आचार्य प्रशांत ने कहा कि महाशिवरात्रि केवल अनुष्ठान का पर्व नहीं, बल्कि यह मनुष्य को अपने भीतर झांकने के लिए प्रेरित करती है। उन्होंने कहा कि शिव को केवल मूर्ति या रूप में सीमित कर देना उनकी व्यापकता को संकुचित करना है। शिवत्व चेतना की पराकाष्ठा हैं। वह स्थिति, जहां व्यक्ति अपने अहंकार को पहचान लेता है। उन्होंने कहा अहंकार का विलोप ही शिवत्व है। जब तक मनुष्य अपने दुखों का कारण बाहरी परिस्थितियों में ढूंढता रहेगा, तब तक वास्तविक मुक्ति संभव नहीं। समस्या बाहर नहीं, दृष्टि में है।ग्रेटर नोएडा। जीबीयू में आयोजित एक कार्यक्रम में पहुंचे आचार्य प्रशांत ने कहा कि महाशिवरात्रि केवल अनुष्ठान का पर्व नहीं, बल्कि यह मनुष्य को अपने भीतर झांकने के लिए प्रेरित करती है। उन्होंने कहा कि शिव को केवल मूर्ति या रूप में सीमित कर देना उनकी व्यापकता को संकुचित करना है। शिवत्व चेतना की पराकाष्ठा हैं। वह स्थिति, जहां व्यक्ति अपने अहंकार को पहचान लेता है। उन्होंने कहा अहंकार का विलोप ही शिवत्व है। जब तक मनुष्य अपने दुखों का कारण बाहरी परिस्थितियों में ढूंढता रहेगा, तब तक वास्तविक मुक्ति संभव नहीं। समस्या बाहर नहीं, दृष्टि में है।ग्रेटर नोएडा। जीबीयू में आयोजित एक कार्यक्रम में पहुंचे आचार्य प्रशांत ने कहा कि महाशिवरात्रि केवल अनुष्ठान का पर्व नहीं, बल्कि यह मनुष्य को अपने भीतर झांकने के लिए प्रेरित करती है। उन्होंने कहा कि शिव को केवल मूर्ति या रूप में सीमित कर देना उनकी व्यापकता को संकुचित करना है। शिवत्व चेतना की पराकाष्ठा हैं। वह स्थिति, जहां व्यक्ति अपने अहंकार को पहचान लेता है। उन्होंने कहा अहंकार का विलोप ही शिवत्व है। जब तक मनुष्य अपने दुखों का कारण बाहरी परिस्थितियों में ढूंढता रहेगा, तब तक वास्तविक मुक्ति संभव नहीं। समस्या बाहर नहीं, दृष्टि में है।ग्रेटर नोएडा। जीबीयू में आयोजित एक कार्यक्रम में पहुंचे आचार्य प्रशांत ने कहा कि महाशिवरात्रि केवल अनुष्ठान का पर्व नहीं, बल्कि यह मनुष्य को अपने भीतर झांकने के लिए प्रेरित करती है। उन्होंने कहा कि शिव को केवल मूर्ति या रूप में सीमित कर देना उनकी व्यापकता को संकुचित करना है। शिवत्व चेतना की पराकाष्ठा हैं। वह स्थिति, जहां व्यक्ति अपने अहंकार को पहचान लेता है। उन्होंने कहा अहंकार का विलोप ही शिवत्व है। जब तक मनुष्य अपने दुखों का कारण बाहरी परिस्थितियों में ढूंढता रहेगा, तब तक वास्तविक मुक्ति संभव नहीं। समस्या बाहर नहीं, दृष्टि में है।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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