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Description
आचार्य जी की प्रस्तुत पुस्तक आज के जलवायु परिवर्तन के दौर में लोगों को जागरुक करने की एक अनिवार्य पहल है। हमने आज अपनी प्रकृति की जो दुर्दशा की है उसे सुधारने का एकमात्र उपाय है प्रकृति और स्वयं के रिश्ते को समझना। हम जीते तो प्रकृति में ही हैं पर प्रकृति को न समझ पाने से अपने दुखों, बन्धनों और कामनाओं को कभी नहीं समझ पाते। हम एक पूरा जीवन बेहोशी में गुज़ार देते हैं। हम अपनी अपूर्णता और असआचार्य जी की प्रस्तुत पुस्तक आज के जलवायु परिवर्तन के दौर में लोगों को जागरुक करने की एक अनिवार्य पहल है। हमने आज अपनी प्रकृति की जो दुर्दशा की है उसे सुधारने का एकमात्र उपाय है प्रकृति और स्वयं के रिश्ते को समझना। हम जीते तो प्रकृति में ही हैं पर प्रकृति को न समझ पाने से अपने दुखों, बन्धनों और कामनाओं को कभी नहीं समझ पाते। हम एक पूरा जीवन बेहोशी में गुज़ार देते हैं। हम अपनी अपूर्णता और अस आचार्य जी की प्रस्तुत पुस्तक आज के जलवायु परिवर्तन के दौर में लोगों को जागरुक करने की एक अनिवार्य पहल है। हमने आज अपनी प्रकृति की जो दुर्दशा की है उसे सुधारने का एकमात्र उपाय है प्रकृति और स्वयं के रिश्ते को समझना। हम जीते तो प्रकृति में ही हैं पर प्रकृति को न समझ पाने से अपने दुखों, बन्धनों और कामनाओं को कभी नहीं समझ पाते। हम एक पूरा जीवन बेहोशी में गुज़ार देते हैं। हम अपनी अपूर्णता और अस
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