निर्वासना निरालंब स्वच्छंद बंधनमुक्त
निर्वासनो निरालंब: स्वच्छन्दो मुक्तबन्धनः ।
क्षिप्त: संस्कारवातेन चेष्टते शुष्कपर्णवत् ।।
~ अष्टावक्र गीता, अध्याय १८, श्लोक २१
अनुवाद: वह वासना, आलंबन, परतंत्रता आदि के बंधनों से स्वच्छंद होता है। प्रारब्ध रूपी वायु के वेग से उसका शरीर उसी प्रकार गतिशील रहता है, जैसे वायु वेग से सूखा पत्ता।
आचार्य प्रशांत:… read_more